संस्कृतियों का विकास केवल भौतिक समानों से ही नहीं बल्कि वैचारिक आदान प्रदान , ज्ञान से ही सम्भव हो पाया। ह्यूग डबरली और पॉल पैंगारो के बातचीत वाले सिद्धांतों का सन्दर्भ मेरे जीवन दर्शन को बहुत भाता है क्योंकि दोनों बंधु बातचीत आदान-प्रदान को रेखांकित करते हैं और सीखने की प्रणाली के रूप में संदर्भित करते हैं। स्कूल- कॉलेज के दिनों से ही घंटों गंभीर डिबेट-डिस्कशन करना , कई बार बहुत सशक्त बलपूर्वक अपनी बातों को रखना आदत रही लेकिन जैसे- जैसे उम्र बढ़ता गया बातचीत के मायने भी बदल से गए। खासकर पत्रकारिता - शैक्षणिक टीचिंग में आने के बाद न चाहते हुए भी सुनने की आदत भी पड़ती गयी लेकिन बातचीत के दौरान भावपूर्णता में डूब जाना अभी भी कूट कूट कर व्यक्तित्व में भरा हैं जिसका आनंद आजकल बहुत आ रहा ! अब तो बातचीत जीवोकोपर्जन भी बन चूका हैं इसलिए इसके बिना जीवन अधूरा सा लगता हैं। ह्यूग डबरली और पॉल पैंगारो जी को पीएचडी के दिनों में पढ़ा था काश बचपन के शरारती दिनों में इन्हे समझता -- पत्रकारिता और पैनी होती ! #मानवसंपर्क #बातचीत डॉ संजय कुमार
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