हम चिंताओं, युद्धों, वैश्विक सुरक्षा दुविधा, विचारविहीन राजनीति, चरम स्तर पूंजीवाद, बहुध्रुवीय विश्व, अविश्वास और अवसरवाद से भरी दुनिया में रह रहे हैं। ऐसे में दार्शनिकता कैसे परिभाषित होगी ? स्वस्थ- सुखी जीवन जीने की प्राकृतिक रणनीति क्या होगी? अंतर्दृष्टि तनावपूर्ण समाज तनाव और अवसाद से बचने की कोशिश कर रहा है। लेकिन समुद्र में रहकर जल से अलग होने और संकटग्रस्त परिवेश में संकट से निकलने जैसी बात नहीं है ? स्वचालन , आत्मसंयम लेकिन आदि इत्यादि सामान्य आदमी किन-किन लोगों-रिश्तों से नाता तोड़ें? प्रकृति से ? रोग से ? जब दुनिया ही आपस में जुड़ी हुई है I आधुनिक समाज में नैतिकता, मानवीय मूल्य, सद्भावना सदियों पुराने शब्द हो रहे हैं। आक्रामकता और अवज्ञा समस्या, अधीनता सभी स्थितियों में समाधान विहीन हो चुकी है । हम अन्याय के प्रति ग्रहणशील हो रहे हैं I उसे रोकन भी चाहते है लेकिन रोक नहीं पा रहे। हम जी रहे हैं लेकिन ऐसे वक़्त के साथ जहा दार्शनिकता के आधार पर मनुष्य कार्य नहीं करता नज़र आता I दार्शनिकता का क्या मतलब है ? ऐसे प्रश्न जरूर मन में हिलोरे मारते है परन्तु जब वै...
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